Sunday, July 29, 2018

Aroh Chapter 2 Poetry आरोह अध्याय दो काव्य भाग

विद्यार्थियों

आज हम आरोह पुस्तिका का अध्याय दो काव्य भाग - मीरा करेंगे |


प्रश्न - मीरा कृष्ण की उपासना किस रूप में करती है यह रूप कैसा है ?
उत्तर -   
हम भक्ति को दो रूपों में देखते हैं सगुण भक्ति और निर्गुण भक्ति मीरा कृष्ण के सगुण
रूप के उपासक थी | बचपन से ही कृष्ण भक्ति की भावना उनके अंदर जन्म ले चुकी थी
वह श्री कृष्ण को ही अपना आराध्य मानती थी | मीरा के कृष्ण का रूप मन को मोहने
वाला गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाला सिर के ऊपर मोर मुकट विराजमान श्री कृष्ण
है | मीरा उन्हें अपने पति के रुप में देखती थी वह मीरा के लिए सर्वस्व है कृष्ण के
अतिरिक्त मीरा संसार में किसी को भी अपना नहीं मानती वह स्वयं को उनकी दासी
मानती हैं |

प्रश्न - लोग मीरा को बावरी क्यों कहते हैं ?
उत्तर -
मीरा श्री कृष्ण  की भक्ति में अपनी सुध-बुध खो बैठी है | उसे किसी परंपरा या मर्यादा
का कोई ध्यान नहीं है | कृष्ण भक्ति के लिए उसने अपना राजपरिवार भी छोड़ दिया
विवाहिता होते हुए भी पांव में घुंघरू बांध कर कृष्ण की भक्ति में नाचती है | लोकलाज की
चिंता किए बिना संतों के पास बैठी रहती है | भक्ति कि यह पराकाष्ठा बावले पन को
दर्शाती है इसलिए लोग मीरा को बावरी कहते |


प्रश्न - मीरा जगत को देखकर रोती क्यों है ?
उत्तर -
मीरा जगत  के स्वार्थी रूप को देखकर रो पड़ती है यह देखती है कि जीवन व्यर्थ ही
जा रहा है | लोग संसारिक सुख दुख को असार मानते हैं जबकि उन्हें सच्चाई नहीं
मालूम हु इस संसार में ही उलझे हुए हैं | लोग मीरा को बावरी कहते हैं मीरा संसार के
लोगों को बावरा समझती है |


प्रश्न - मीरा ने सहज मिले अविनाशी क्यों कहा है ?
उत्तर -
मीरा के अनुसार प्रभु अविनाशी हैं अर्थात अनश्वर हैं | उन्हें पाने के लिए मन में सहज
भक्तिभाव की आवश्यकता है उन्हें पाने के लिए सच्चे मन से भक्ति करनी पड़ती है |
इस भक्ति से प्रभु प्रसन्न होकर भक्तों को आसानी से मिल जाते है |

शुभकामनाएं सहित !

नीलम

Aroh Chapter 1 Poetry आरोह प्रथम अध्याय काव्य भाग

विद्यार्थियों

आज हम आरोह पुस्तिका का प्रथम अध्याय काव्य भाग - कबीर करेंगे |


प्रश्न - कबीर की दृष्टि में ईश्वर एक है इसके समर्थन में उन्होंने क्या तर्क दिए?
उत्तर -
कबीर ने ईश्वर की एक ही सत्ता को स्वीकार किया है जिस का स्वरुप सभी जीवो
में दृष्टिगोचर होता है | ईश्वर ज्योति स्वरूप है | संसार में सब जगह एक ही पवन
बहती है | एक ही प्रकार का जल सब की प्यास बुझाता है | एक ही परमात्मा का
अस्तित्व सभी प्राणियों में है प्रत्येक कण में ईश्वर है | सभी जीवो में उसका ही स्वरूप
विद्यमान है | सबको कुम्हार ने एक ही मिट्टी से बनाया है अर्थात परमात्मा रुपी कुम्हार
ने सब को एक ही मिट्टी से बनाया है |

प्रश्न - कबीर ने ऐसा क्यों कहा कि संसार बोरा गया है ?
उत्तर -
कबीर के अनुसार संसार बोरा गया है | सच पर विश्वास नहीं करता झूठे और ढोंगी
व्यक्ति पर अपना विश्वास कर लेता है | अर्थात जो व्यक्ति सच बोलता है | उसे मारने को
दौड़ता है | कबीर दास तीर्थ स्थान तीर्थ यात्रा टोपी पहनना, मालापहनना, तिलक लगाना,
मंत्र देना आदि तौर-तरीकों को गलत बताते हैं  राम और रहीम की श्रेष्ठता के नाम पर लड़ने
वालों को गलत मानता है | कबीर के अनुसार परमात्मा एक ही है और वह सब जगह
विराजमान है | कण-कण में है |और वह सहज भक्ति से प्राप्त हो जाता है  ईश्वर को
एक ही स्वरुप ना स्वीकार करते हुए लोग पत्थरों में और तीर्थ स्थानों में भगवान को ढूंढत हैं |
बाह्य आडंबरों द्वारा उस परमात्मा को पाने की कामना करते हैं परंतु अपने भीतर स्थित उसके
स्वरूप को देख नहीं पाते इसलिए कबीर की दृष्टि में यह सब पागलपन है | कबीर के अनुसार
आत्मा ही परमात्मा है अर्थात हर जीव में परमात्मा का निवास है |

प्रश्न - कबीर ने अपने आप को दीवाना क्यों कहा है ?
उत्तर -
कबीर ने माया मुक्त संसार और निर्गुण परमतत्व की सत्ता के अंतर को पहचान लिया
है | उसे सभी मनुष्यों में, सभी जीवो में उसी परमतत्व के दर्शन होते हैं | वही ज्योति का
स्वरूप सब में जगमग  रहा है | यह सब जानकर कबीर आप निडर हो गए हैं उनके मन
में मोह माया संबंधी कोई डर नहीं है | दीवानों की तरह में जगह-जगह ईश्वर के स्वरूप
को ही देखते हैं | वह स्वयं संसार के राग द्वेष से लाभ हानि से मोह माया से दूर हो गए
हैं मैं परमात्मा के सच्चे साधक हो गए हैं | परमात्मा के गूढ़ रहस्य को जान गए हैं कि
हम सब में एक ईश्वर निवास करता है |

प्रश्न - कबीर की दृष्टि में किन लोगों को आत्मबोध नहीं हो पाता ?
उत्तर -
जो लोग ईश्वर को मन के भीतर ना खोज कर ईश्वर को पाया आडंबरों के सहारे मंदिर
मस्जिदों में खोजते हैं वे लोग माला तिलक टोपी धारण करके पीपल और मूर्तियों की
पूजा करते हैं तीर्थ और व्रतों का कठोरता से पालन करते हैं जो बाहर साखी शब्द गा रहे
हैं लेकिन उनके शिष्य घर-घर जाकर गुरु मंत्र देते हैं जो कुरान और धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने
और पढ़ाने पर जोर देते हैं जो धर्म के नाम पर पशुओं का वध करते हैं, मांस खाते हैं, माया
के अधीन है स्वयं को बहुत बड़े ज्ञानी होने का अहंकार पालते हैं इन सब को आतम ज्ञान
नहीं हो पाता |

प्रश्न - कबीर ने नियम और धर्म का पालन करने वाले लोगों की किन कमियों की
ओर संकेत किया है ?
उत्तर -
कबीर ने नियम और धर्म का पालन करने वाले लोगों की मुख्य कमी यह मानी है कि
वह परमात्मा तत्व से  कोसों दूर है | सच्चे ज्ञान को नहीं जान पाए ऐसे लोग वास्तविक
ज्ञान से परे हैं | ईश्वर तो उनके हृदय में बसा है | जिसे पहचानने की आवश्यकता है |
इसके लिए किसी प्रकार के आडंबर की आवश्यकता नहीं है |

प्रश्न - अज्ञानी गुरुओं की शरण में जाने पर शिक्षकों की क्या गति होती है ?
उत्तर -  
गुरु ही शिष्य को ज्ञान देकर ईश्वर का साक्षात्कार करवाता है यदि गुरु स्वयं अज्ञानी है
उसे ही परमात्मा का सच्चा ज्ञान नहीं है | वह स्वयं  माया और अहंकार के अधीन है तो
ऐसे अज्ञानी गुरु की शरण में जाने वाले शिष्य भी अज्ञान के पथ पर अग्रसर हो जाते हैं |
गुरु और शिष्य दोनों ही माया में भ्रमित होकर डूबते हैं ऐसे शिष्यों को अंत में पछताना
ही पड़ता है |


शुभकामनाएं सहित !

नीलम

Monday, July 23, 2018

Aroh Chapter 1 Literature आरोह प्रथम अध्याय गद्य भाग

विद्यार्थियों!

आज हम आरोह पुस्तिका का प्रथम अध्याय
गद्य भाग - नमक का दारोगा करेंगे |


प्रश्न - कहानी का कौन सा पात्र आपको सर्वाधिक प्रभावित करता है और क्यों?
उत्तर -
कहानी का नायक वंशीधर हमें सर्वाधिक प्रभावित करता है | वह इमानदार कर्तव्यपरायण
धर्मनिष्ठ व्यक्ति है | सके पिता उसे बेईमानी का पाठ पढ़ाते हैं घर की दयनीय दशा का
हवाला भी देते हैं परंतु वह इन सब के विपरीत ईमानदारी का व्यवहार करता है वह स्वाभिमानी
है | अदालत में उसके खिलाफ गलत फैसला लिया गया परंतु उसने स्वाभिमान नहीं खोया
उसकी नौकरी भी छीन ली गई परंतु उसकी चारित्रिक दृढ़ता हमें प्रभावित करती हैं |
आखिरकार पंडित अलोपीदीन भी उसकी इस दृढ़ता पर मुग्ध हो जाते हैं | उसे वह अपनी
सारी जायदाद का आजीवन मैनेजर बना देते हैं |


कहानी का दूसरा पात्र अलोपीदीन भी हमें प्रभावित करता है | पंडित अलोपीदीन मृदुभाषी
वाक्पटु और दूरदृष्टि का स्वामी है साधन संपन्न और समाज में प्रतिष्ठित है | जो गुण वंशीधर
में है वह पंडित अलोपीदीन में नहीं है | कहानी के अंत में अलोपीदीन सभी पाठकों के मन पर
अपनी एक अनूठी छाप छोड़ता है कि वह दरोगा मुंशी दर को अपने यहां पूरी जायदाद का
मैनेजर बनाकर और अलोपीदीन एक निपुण व्यवसाई भी है | भलीभांति समझने वाला अति
कुशल व्यापारी था मैं अपने सभी कार्य को येन केन प्रकारेण करवा लेता था| पकड़े जाने पर
भी उसने अदालत के माध्यम से अपनी रक्षा कर ली थी | रक्षा ही नहीं किया अपितु वंशीधर
को नौकरी से भी निकलवा दिया| लक्ष्मी का उपासक का और ईमानदारी का कायल था |
हमें कहानी में दो ही पात्र प्रभावित करते है |

प्रश्न - सत्यवादी होते हुए भी वंशीधर अकेले क्यों पड़ गए थे ?
उत्तर -
सत्यवादी होते हुए भी वंशीधर अदालत में बिल्कुल अकेले पड़ गए थे क्योंकि वह सत्यवादी
और कर्तव्यपरायण व्यक्ति थे | अदालत में सभी व्यक्ति किसी न किसी कारण अलोपीदीन के
एहसानों के तले दबे हुए थे | इन सभी ने उससे किसी न किसी प्रकार की कृपा दया अवश्य
प्राप्त की हुई थी | वह सब अलोपीदीन को बचाने में लगे हुए थे | अदालत में सत्य की शक्ति
रिश्वत के बोझ के तले दब के रह गई |

प्रश्न - नमक का दरोगा पाठ का प्रतिपाद्य बताइए ?
उत्तर -
नमक का दरोगा प्रेमचंद की बहुचर्चित कहानी है | जिसमें यथार्थवाद का एक मुकम्मल उदाहरण
है | यह कहानी धन के ऊपर धर्म की जीत है धन और धर्म को कर्म क्षेत्र सद्वृत्ति और असद
वृत्ति  बुराई और अच्छाई असत्य और सत्य कहा जा सकता है | कहानी में इन का प्रतिनिधित्व
क्रमशा पंडित अलोपीदीन और मुंशी वंशीधर नामक पात्रों ने किया है | ईमानदार कर्म योगी
मुंशी वंशीधर को खरीदने में असफल रहने के बाद पंडित अलोपीदीन अपने धन की महिमा
का उपयोग कर उन्हें नौकरी से हटवा देते हैं | लेकिन अंत में सत्य के आगे उनका सिर झुक
जाता है | अंत में सरकारी विभाग से बर्खास्त वंशीधर को बहुत उनके वेतन और भत्ते के साथ
अपनी सारी जायदाद का स्थाई मैनेजर नियुक्त करते हैं और गहरे अपराध से भरी हुई वाणी
से निवेदन करते हैं परमात्मा से यही प्रार्थना करता हूं कि आप को सदैव वही नदी के किनारे
वाला बेमुरौवत उद्दंड किंतु धर्मनिष्ठ दरोगा बनाए रखें |

कहानी के अंत में प्रसंग से पहले तक सभी घटनाएं प्रशासनिक  और न्यायिक व्यवस्था में
व्यापक भ्रष्टाचार तथा उस भ्रष्टाचार की व्यापक सामाजिक स्वीकार्यता को अत्यंत  साहसिक
तरीके से उजागर करती है | ईमानदार व्यक्ति के अभिमन्यु के साथ निहत्थे और अकेले पड़ जाने
के यथार्थ तस्वीर भी मिलती है | प्रेमचंद इस संदेश पर कहानी को खत्म नहीं करना चाहते थे
क्योंकि उस दौर में भी मानते थे कि ऐसा यथार्थवाद  हमको निराशावादी बना देता है | मानव
चरित्र पर से हमारा विश्वास उठ जाता है हमको चारों तरफ बुराई ही बुराई नजर आने लगती
है इसलिए कहानी का अंत सत्य की जीत के साथ खत्म होता है | अंत में सच्चाई की जीत होती है |


मुख्य पात्र की विशेषताए
1 - वंशीधर                                                                                                             
- कर्तव्यनिष्                         
- लालच नहीं करने वाला
- कठोर तथा दृढ़ चरित्र
- स्वाभिमानी
- संवेदनशील
- विचारवान
- धर्म परायण
- ईमानदार  

2 - अलोपीदीन
- भ्रष्ट आचरण

- धन का उपासक
- प्रभावशाली व्यक्तित्व
- व्यवहार कुशल तथा वाक्पटुता  
- मानवीय गुणों का सम्मान करने वाला  

शुभकामनाएं सहित !


नीलम

Sunday, July 15, 2018

Vitan Chapter 2 वितान अध्याय दो

विद्यार्थियों !

आज हम वितान पुस्तिका का अध्याय दो करेंगे - राजस्थान की रजत बूंदें |

प्रशन - राजस्थान में कुंई किसे कहते हैं ? इसकी गहराई और व्यास तथा सामान्य कुओं
की गहराई और व्यास में क्या अंतर है ?
उत्तर -
राजस्थान में   रेत बहुत होती है | वर्षा का पानी रेत में समा जाता है जिस से नीचे की सतह
पर नमी फैल जाती है | यह नमी खड़िया मिट्टी की परत के ऊपर तक रहती है | इस नमी
क्यों पानी के रूप में बदलने के लिए 4 या 5 हाथ के व्यास की जगह को 30 से 60 हाथ
की गहराई तक खोदा जाता है | खुदाई के साथ-साथ चिनाई भी की जाती है | इस चिनाई
के बाद खड़िया की पट्टी पर रिस रिस कर कर पानी  इकट्ठा हो जाता है | इसी तंग गहरी
जगह को कई कहा जाता है यह कुएं का स्त्रीलिंग रूप है | यह कुएं से केवल व्यास में छोटी
होती है परंतु गहराई में लगभग समान ही होती है | आम कुए का व्यास 15 से 20 साल का
होता है हाथ का होता है , परंतु कुंई का व्यास चार या पांच हाथ का होता है | क्षेत्र के
आधार पर कुइयां की गहराई में अंतर आ जाता है |


प्रश्न - चेजारा के साथ गांव - समाज के व्यवहार मैं पहले की तुलना में आ
ज क्या फर्क है पाठ के आधार पर बताइए ?
उत्तर -
चेजारा अर्थात चिनाई करने वाला | कुंई  के निर्माण में यह लोग दक्ष होते हैं | इनका उस
समय विशेष ध्यान रखा जाता था | कुंई खोदने पर इन विदाई के समय तरह-तरह की भेंट
दी जाती थी इसके बाद भी उनका संबंध गांव से जुड़ा रहता था और पूरा वर्ष उन को
सम्मानित किया जाता था | फसल की कटाई के समय इन्हें अलग से फसल का हिस्सा
दिया जाता था तीज त्यौहार विवाह जैसे अवसरों पर उनका सम्मान किया जाता था |
इस प्रकार इनको भीग्रामीण समाज में सम्मान के साथ जीने का अवसर मिलता था और
उनके कार्य को सराहा भी जाता था | वर्तमान समय में इनका सम्मान उतना नहीं रहा जितना
कि पहले था | उनको काम की मजदूरी देकर संबंध खत्म कर दिए जाते हैं | अब सिर्फ
मजदूरी देकर काम करवा लिया जाता है अब स्थिति पूर्णता बदल गई है |

प्रश्न - निजी होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र में कुइयो पर ग्राम समाज का अंकुश लगा
रहता है लेखक ने ऐसा क्यों कहा ?
उत्तर -
राजस्थान में खड़िया पत्थर की पट्टी पर ही कुइयो  का निर्माण किया जाता है | कुंई का
निर्माण गांव समाज की सार्वजनिक जमीन पर होता है | परंतु उसे बनाने और उसमें पानी
लाने का हक उसका अपना हक है | सार्वजनिक जमीन पर बरसने वाला पानी ही बाद में
वर्ष भर नमी की तरह सुरक्षित रहता है | इसी नमी से साल भर कुइयो में पानी भरता है
नमी की मात्रा वहां हो चुकी वर्षा से तय हो जाती है |

अतः उस क्षेत्र में हर  नई कुंई का अर्थ है पहले से तय नमी का बंटवारा इस कारण निजी
होते हुए भी सार्वजनिक क्षेत्र से में बनी कुइयो पर ग्राम समाज का अंकुश लगा रहता है |
यदि वह अंकुश ना हो तो लोग घर घर कई-कई कुईया बना ले और सब को पानी नहीं
मिलेगा बहुत जरूरत पड़ने पर समाज अपनी स्वीकृति देता है |


प्रश्न - कुंई निर्माण से संबंधित निम्न शब्दों के बारे में जानकारी दें?
उत्तर -
i) पालर पानी -
यह पानी का एक रुप है यह पानी सीधे बरसात से मिलता है यह पानी नदियों तालाबों
कृत्रिम जिलों बड़े-बड़े गड्ढों में रुक जाता है | इस पानी को प्रयोग में नहीं लाया जा
सकता इस पानी का वाष्पीकरण जल्दी होता है काफी पानी जमीन के अंदर चला जाता
है और अधिकांश पानी वाष्प बनकर उड़ जाता है |

ii) पाताल पानी -
जो पानी भूमि में जाकर  भूजल में मिल जाता है उसे पताल पानी कहते हैं | इसे को पंप
ट्यूबवेलों आदि के द्वारा निकाला जाता है |

iii) रेजानी पानी -
यह पानी धरातल से नीचे उतरता है परंतु धरातल में नहीं मिलता है | यह पार्लर पानी
और पताल पानी के बीच का है वर्षा की मात्रा नापने में इंच या सेंटीमीटर नहीं बल्कि
रेजा शब्द का उपयोग होता है | रेज का माप धरातल में समाई वर्षा को ना पता है |
रेजानी पानी खड़िया पट्टी के कारण पताली पानी से अलग बना रहता है तथा इसे कुइयो
के माध्यम से इकट्ठा किया जाता है |

शुभकामनाएं सहित !

नीलम

Wednesday, July 11, 2018

Vitan Chapter 1 वितान प्रथम अध्याय

विद्यार्थियों !

आज हम वितान पुस्तिका का प्रथम अध्याय करेंगे -
कुमार गंधर्व द्वारा लिखित भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ लता मंगेशकर |

प्रश्न - लता जी की गायकी की क्या विशेषताएं है ?
उत्तर -
1 सुरीला पन
2 कोमलता और निर्मलता
3 मधुरता का संगम और शास्त्र शुद्धता
जो लता जी के  स्वर में पवित्रता तल्लीनता है किसी भी अन्य में ऐसी तल्लीनता नहीं है |

प्रश्न - कुमार गंधर्व ने लता को बेजोड़ गायिका क्यों कहा ?
उत्तर -
कुमार गंधर्व के अनुसार लता मंगेशकर भारतीय गायिकाओं में बेजोड़ है | उनके मुकाबले खड़ी होने
वाली एक भी गायिका नजर नहीं आती उनसे पहले नूरजहां का सिक्का चलता था | परंतु लता ने
उन्हें बहुत पीछे छोड़ दिया | पिछले 50 वर्षों से वे गायिका के क्षेत्र में पूरी तरह छाई हुई है यद्यपि
इस लंबी अवधि में अनेक गायिकाएं उभरी किंतु लता का स्थान सदैव उनके ऊपर बना रहा 50
साल के बाद भी आज उनका स्वर पहले की तरह कोमल सुरीला मनभावन बना हुआ है | लता
बेजोड़ इसलिए भी है कि उनके गान में गानपन  पूरी तरह मौजूद है | शास्त्रीय संगीत से परिचित
होती हुई भी सुगम संगीत में गाती हैं | अपनेतथा अपने सुरीले पन और गूंज से सभी श्रोताओं को
सीधे प्रभावित करती हैं उनके गानों को सुनकर देश के आम गायकों और श्रोताओं की संगीत
अभिरुचि परिष्कृत हुई है |

प्रश्न - नाद में उच्चारण का क्या अर्थ है यह लता के गायन में किस प्रकार प्रकट हुआ है ?
उत्तर -
नाद में उपचार का अर्थ है उच्चारण में गूंज का होना |  लता के गायन में यह विशेषता है कि
उनकी एक शब्द की गूंज दूसरे शब्द की गूंज में इस तरह मिल जाती है कि दोनों एक दूसरे
में लीन हो जाते हैं | यह विशेषता केवल लता के स्वर में ही है |


प्रश्न - शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत में क्या अंतर है ?
उत्तर -
शास्त्रीय संगीत और चित्रपट संगीत दोनों का लक्ष्य आनंद प्रदान करना है |
फिर भी दोनों में बहुत अंतर है शास्त्रीय संगीत मे ताल का पूरा ध्यान रखा जाता है,
जबकि चित्रपट संगीत में आधे ताल का उपयोग होता है चित्रपट संगीत में गीत और
आघात को ज्यादा महत्व दिया जाता है | सुलभता तथा लोच को आद्र स्थान सुलभता
तथा लोच को अग्र स्थान दिया जाता है उसे शास्त्रीय संगीत की भी उत्तम जानकारी होना
आवश्यक है क्योंकि 3:30 मिनट के गाए हुए चित्रपट संगीत और खानदानी शास्त्रीय
संगीत की तीन-साढ़े 3 घंटे की महफिल का कलात्मक आनंद मूल्य एक ही है |

प्रश्न - कुमार गंधर्व ने लता मंगेशकर को बेजोड़ गायिका माना है क्यों ?
उत्तर -
क्योंकि लता मंगेशकर के मुकाबले में कोई भी गायिका नहीं है | नूरजहां अपने समय
की प्रसिद्ध चित्रपट संगीत की गायिका थी परंतु  लता की गायकी ने उसे पीछे छोड़
दिया लता जी पिछले 50 वर्षों से एक छत्र राज कायम किया हुआ इतने लंबे समय
के बावजूद उनके स्वर पहले की तरह कोमल सुरीला में मनभावन है |
इसके कई कारण है -
i) गायन में जो गान पन है वह किसी गायिका में नहीं मिलता |
ii) उच्चारण में शुद्धता वह नाद का संगम और भावों में जो निर्मलता
है अन्य गायिकाओं में नहीं है |
iii) एक तो लता जी की सुरीली आवाज ईश्वर की देन थी ऊपर से उन्होंने मेहनत
से उसे और निखार दिया |
iv) लता जी शास्त्रीय संगीत से परिचित है परंतु फिर भी सुगम संगीत में गाती
थी उनके गानों को सुनकर देश-विदेश में लोग दीवाने होते हैं उन्होंने आम व्यक्ति
की संगीत के प्रति अभिरुचि को परिष्कृत किया है |
शुभकामनाएं सहित !

नीलम